समय बदल रहा है। बदलते समय के साथ हमारे समाज के रहन-सहन में बदलाव आता जा रहा है। विश्व की आर्थिक स्थिति तथा इन्टरनेट के रिश्ते ने हमारे सीखने की आदतों को भी प्रभावित कर दिया है। सीखने के नए तरीकों ने नई नस्ल को आज डिजिटल एज में पहुंचा दिया है। इस एज का अपना अलग एक चिंतन और व्यवहार है और सबसे अलग रहन-सहन का विशिष्ट तरीका भी। सूचना-तंत्र की अपनी गति और विशिष्ट शैली ने हमारे सामाजिक जीवन को इतना प्रभावित कर दिया है की डिजिटल एज से पहले की पीढ़ी आज न केवल हतप्रभ है बल्कि आश्चर्यचकित भी है। शोर के बढ़ते हुए ग्राफ ने नॉन डिजिटल एज की पीढ़ी को काफी असमंजस की स्थिति में ला खडा किया है। शोर ने उसे हायर एंड कारों की पिछली सीट तक आ दबोचा है, जहाँ टीवी सेट का प्रावधान होता है। पेन-ड्राईव में डाउनलोड त्वरित सूचना तकनीकी, उसी में एफएम रेडियो बिल्ट-इन और मोबाईल में मूवीस डिजिटल एज की पहली पसंद बन चुकी है। ये मोबाइल फोन, गेम्स और एसेमेस सहित इन्टरनेट गेमिंग-स्टेशन के आगे का पड़ाव है।...... टीवी के अनेक निजी चैनलों में आज भी दूरदर्शन की अपनी मर्यादा है. दूरदर्शन को हम कितना ही कोसें, पर उसने मर्यादा को कायम रखा है । वह अपने देश की पहचान कराता है, अपने देश की मिली-जुली सभ्यता और संस्कृति से परिचय कराता है। वह देश में आज भी सबसे अधिक देखा जाने वाला चैनेल है। व्यवसाय में भी पीछे नहीं है । अगर वह राजनितिक प्रभावों, मीडियाकरों, दलालों तथा भ्रष्टाचार से मुक्त हो जाए तो आज भी वह सर्वोपरि है। उसके श्रोताओं की संख्या आज भी अत्यधिक है। उसके कार्यक्रमों में स्तरीयता होती है और उसके आधिकारियों, इंजीनियरों औरतकनीशियनों को अपने हुनर की समझ होती है और वे अपनी हदें जानते हैं.
शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010
बच्चे हैं मत रोक लगाओ, इनको चाँद पे जाने दो...
गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010
जब बावा ने आब्ज़र्वर हिन्दी का संपादक बनना चाहा
जब बावा ने .../रंजनजैदी
हिन्दी आब्ज़र्वर के भी प्रिंटर पब्लिशर शम्सुज्ज़मान साहब ही जमा साहब संजय डालमियां का पीआर वर्क भी देखा करते थे। उन दिनों मैं इसी अखबार को ज्वाईन करना चाहता था और शम्स साहब भी चाहते थे के मैं इस अखबार को ज्वाईन करूँ । एक दिन उनहोंने होटल जनपथ की लाबी में काफ़ी के सिप लेते रहने के दौरान अपने दिल की बात कुछ इस तरह से कही के मैं चौंक पडा। उन्होंने मुझ से पूछा के क्या ये मुमकिन है की कमलेश्वर जी आब्ज़र्वर का सम्पादन सभाल लें ? मेरा जवाब था के उनसे पूछकर ही कुछ कहा जा सकता है। जमा साहब बहुत परेशान थे। उन दिनों वो आब्ज़र्वर के भीतर की उठा-पटक से चिंतित थे। कन्हय्या लाल नंदन सम्पादक थे, त्रिलौक्दीप उनके सहायक। कम्लेश्वेर जी से मैं रूटीन की तरह घर पर मिला और चर्चा की।उसवक्त उनके साथ भाभी यानी गायेत्री जी भी थीं और सम्बंधित मुद्दे पर वो चर्चा में शामिल भी थीं। ७०,०००/-की सेलरी पर बावा राज़ी हो गए। मैंने ये बात जमा साहब को बतादी। वो इस ख़बर से बहुत खुश नज़र आए। मेरे लिए भी ये एक अच्छा संकेत था। कमलेश्वर जी के साथ मैं दैनिक जागरण में काम कर चुका था।, और वैसे भी उनसे और उनके परिवार से मेरे पुराने सम्बन्ध थे, लेकिन एक दिन ख़बर आई की अखबार बंद हो गया .........

